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India: Rural Workers Demand Their Rights - Ranchi Sit-in Press Release of 13 December 2017

14 December 2017

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Rural Workers Demand their Rights

(Ranchi, 13 December 2017)

Close to 1,000 NREGA workers and other rural labourers converged to Birsa Chowk from 12 districts of Jharkhand today and sat on dharna to protest against repeated attacks on their right to food and right to work. The event was jointly organised by Right to Food Campaign Jharkhand and NREGA Watch.

The dharna was prompted by a series of recent starvation deaths in Jharkhand. The starvation deaths epitomise the hardships that millions of people endure when it comes to securing their rights under NREGA and the public distribution system.

Many NREGA workers at the dharna spoke about the problems they are facing. More than 10 years after the Act came into force, they still have to fight at every step to get work, to be paid on time, and for higher wages. For instance, delays in wage payments continue, and payment problems, if anything, have increased after Aadhaar-based payments were introduced. Vilas Singh from Barwadih, for instance, is still struggling to get his wages, months after working on NREGA. Initially he was told that his account had been closed. He then went through a long process of KYC update and Aadhaar authentication, but the payment system is still returning an “invalid Aadhaar” error message.

Further, the government is paying only a fraction of the compensation due to NREGA workers for delays in payments. Rajendran Narayanan from Azim Premji University explained how, based on a detailed analysis of NREGA payments, he and his colleagues had found that Rs 1,200 crores of compensation money was due to workers. Of this, the government admits only Rs 519 crores, and just Rs 30 crores have actually been paid.

The government’s failure to raise NREGA wages is another injustice done to NREGA workers. In Jharkhand, the NREGA wage rate was raised (from Rs 162 per day) by five rupees last year, and just one rupee this year!
The audience heard similar grim tales about the public distribution system. Common complaints include cancellation of ration cards due to failed Aadhaar linkage, missing names on the ration card, biometric failures, and katauti (cuts) by corrupt dealers. Manikchand, from a particularly vulnerable tribal group (PVTG) in Garhwa, explained that even PVTG families in Jharkhand are often deprived of PDS rations as the new ‘dakiya system’ of direct delivery to their homes routinely fails.

The PDS in Jharkhand, already weakened by compulsory biometric authentication, is in danger of being further undermined by a transition to cash transfers. Akash Ranjan and Afzal Anis reported the findings of a quick investigation of the DBT system recently introduced in Nagri block of Ranchi district. Poor people in Nagri are running from pillar to post, trying to extract cash from the bank (often without knowing which account the money has been sent to) so that they can buy their food rations at Rs 32 per kg – instead of Re 1/kg in the earlier system – from the ration shop. The speakers warned against the imminent extension of this counter-productive system to other parts of Jharkhand.

There was also much discussion of the recent starvation deaths. Taramani Sahu, the courageous woman who drew attention to the starvation death of an 11-year old girl (Santoshi Kumari) in Simdega, gave a detailed account of the facts. From 20 August 2017 onwards, she had tried to help Santoshi’s family to get a new ration card, after the old ration card was cancelled for lack of Aadhaar linking. (On 27 March 2017, the Chief Secretary of Jharkhand ordered mass cancellation of ration cards not linked with Aadhaar.) But Santoshi died, after going for 8 days without food, before a new ration card was issued. Since then, Taramani has been continuously harassed by the Jharkhand government. In this and all other recent cases of starvation death, the government is refusing to accept the facts and hounding the victims.
The first part of the dharna culminated in a spirited ‘thali bajao’ session, by way of protest against these and other violations of people’s right to food and right to work.

For further information, please contact Asharfi (9334463332) or James (9470396732, 9852910778).

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नरेगा मज़दूरों ने मांगे अपने अधिकार

(रांची, 13 दिसंबर 2017)

आज बिरसा चौक पर राज्य के 12 जिलों से आए लगभग 1,000 नरेगा व अन्य मज़दूरों ने उनके रोज़ी-रोटी के अधिकारों के लगातार हनन के विरुद्ध धरना दिया. यह धरना भोजन का अधिकार अभियान व नरेगा वॉच द्वारा संयुक्त रूप से आयोजित किया गया था.

पिछले कुछ महीनों में झारखंड में भूख से कई मौतें हुई हैं. ये मौतें करोड़ों लोगों को अपने नरेगा और जन वितरण प्रणाली के अधिकारों को पाने में आने वाली परेशानियों के प्रतीक हैं.

धरने में उपस्थित कई मज़दूरों ने उनको होने वाली कठिनाइयों के बारे में बात रखी. इस कानून को पारित होने के 10 वर्षों बाद भी मज़दूरों को हर कदम पर संघर्ष मरना पड़ता है – चाहे समय पर काम पाने के लिए, समय पर भुगतान के लिए या फिर मज़दूरी दर बढ़ाने के लिए. उदाहरण के लिए, मज़दूरी भुगतान में विलम्ब अभी भी जारी हैं, बल्कि भुगतान को आधार से जोड़ने के बाद तो विलम्ब बढ़ गए हैं. बरवाडीह से आए विलास सिंह को काम करने के कई महीनों बाद तक भी अपनी मज़दूरी नहीं मिली है. पहले उन्हें बोला गया था कि उनका खाता बंद हो गया है. फिर जब उन्होंने KYC की प्रक्रिया कि लिए अपना आधार नंबर व अन्य जानकारी दी, तो उन्हें सन्देश आया कि उनका आधार “अवैद्य” (invalid) है.
और तो और, सरकार मज़दूरी भुगतान में हो रहे विलम्ब के लिए देय मुआवज़े के एक बहुत छोटे अंश का ही भुगतान कर रही है. अज़ीम प्रेमजी के राजेंद्रन नारायणन ने बताया कि उनके द्वारा किए गए एक शोध में यह पता चला कि हालांकि 1,200 करोड़ रुपये का मुआवजा देय था, सरकार के अनुसार मज़दूरों को मुआवज़े के रूप में केवल 519 करोड़ रुपये ही मिलना था, जिसमें से वास्तव में केवल 30 करोड़ रुपये का ही भुगतान हुआ है.

नरेगा मज़दूरी का कम दर भी मज़दूरों के शोषण का एक स्त्रोत है. पिछले वर्ष झारखंड की नरेगा मज़दूरी केवल पांच रुपये ही बढ़ी थी (162 रुपये से), और इस वर्ष केवल 1 रुपये!

धरने में उपस्थित लोगों ने जन वितरण प्रणाली की दयनीय स्थिति के बारे में भी सुना. आधार से जुड़ा न होने के कारण राशन कार्ड रद्द हो जाना, राशन कार्ड में परिवार के कुछ सदस्यों के नाम न होना, POS मशीन द्वारा उँगलियों के निशान न पहचाने जाना, भ्रष्ट डीलरों द्वारा अनाज में कटौती करना जन वितरण प्रणाली की कुछ आम समस्याएं हैं. गढ़वा के मानिकचंद कोरवा ने बताया कि हालाकि आदिम जनजाति परिवारों को ‘डाकिया योजना’ के तहत अपने घर तक राशान मिलना है, वे इस सुविधा से वंचित हैं और उन्हें नियमित रूप से पूरा अनाज नहीं मिलता.

झारखंड की जन वितरण प्रणाली, जो आधार के कारण पहले से ही काफी कमज़ोर है, अब नकद हस्तांतरण से और खतरे में है. अफज़ल अनीस और आकाश रंजन ने रांची ज़िले के नगडी प्रखंड में शुरू हुए नकद हस्तांतरण के पायलेट की जांच के निश्कर्ण रखें. उन्होंने बताया कि गरीब परिवारों को बैंक से राशि निकालकर 32 रुपये प्रति किलो के दर से राशन खरीदने में कई समस्याएं हो रही हैं. कई बार परिवारों को पता नहीं चलता कि पैसा उनके किस खाते में गया है. उन्होंने यह भी कहा कि इस जन-विरोधी नीति का राज्य के बाकी क्षेत्रों में विस्तार का भी खतरा है.

हाल में हुई भूख से मौतों पर भी काफ़ी चर्चा हुई. तारामनी साहू, जिन्होंने सिमडेगा में 11-वर्षीय लड़की (संतोषी कुमारी) की भूख से हुई मृत्यु पर लोगों का ध्यान आकर्षित किया, ने इस घटना के तथ्यों को लोगों के समक्ष रखा. 20 अगस्त 2017 से वे संतोषी के परिवार को एक नया राशन कार्ड दिलवाने का प्रयास कर रही थी, क्योंकि परिवार का पुराना राशन कार्ड आधार-सीडिंग न होने के कारण रद्द हो गया था. (27 मार्च 2017 को झारखंड के मुख्य सचिव ने आधार से न जुड़े सब राशन कार्डों को रद्द करने का आदेश दिया था.) पर संतोषी राशन के अभाव में आठ दिन भूखी रही. तब से, तारामनी और संतोषी की मां को झारखंड सरकार द्वारा लगातार प्रताड़ित किया जा रहा है. इस मामले, और बाकी भूख से हुई मौतों में सरकार तत्थ्यों को मानने के लिए राजी नहीं है और उल्टा भूख के शिकार हुए परिवारों को परेशान कर रही है.

धरने का पहला चरण लोगों के भोजन, रोज़गार व अन्य अधिकारों के उलंघन के विरुद्ध हुए थाली बजाओ कार्यक्रम से संपन्न हुआ.

अधिक जानकारी के लिए अशर्फ़ी नन्द प्रसाद (9334463332) या जेम्स हेरेंज (9470396732, 9852910778) को संपर्क करें.