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India: NREGA Sangharsh Morcha’s submission to MoRD constituted committee for NREGA wage revision / नरेगा संघर्ष मोर्चा का नरेगा मज़दूरी के संशोधन के लिए गठित कमिटी को मांग पत्र

1 July 2017

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Shri Nagesh Singh,
Additional Secretary,
Ministry of Rural Development,
Krishi Bhawan,
New Delhi

Subject: Concerns with and recommendations for the revision of MGNREGA wage rates

Dear Shri Nagesh Singh,

NREGA Sangarsh Morcha is a national level platform of trade unions, people’s organisations, NGOs and individuals who are engaged in ensuring people’s rights to fair wages and guaranteed employment under the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA). We have seen from news reports that a committee under your chairmanship is engaged in considering issues related to the wage rate in MGNREGA. We would therefore like to bring the following to the attention of your committee:

1. MGNREGA schemes involve work that is equivalent to work done in agriculture or in construction work. However, MGNREGA wages are below the declared minimum wage for agriculture and for construction work in many states. This is in direct violation of the fundamental right to equality given in Article 14. It also violates the fundamental right to life guaranteed by Article 21, forcing people to work at less than subsistence wages. In fact, working for less than the minimum wage amounts to forced labour, as per Supreme Court orders and is in violation of Article 23 of the Constitution that prohibits forced labour.

2. The base wage for the MGNREGA wage being well below the minimum wage in various states, revisions once every year according to the CPI-AL have resulted in minuscule and ridiculous increase in wages. For 2017-18, the wage revision has been as little as Re 1 for Assam, Bihar, Jharkhand, Uttar Pradesh and Uttarakhand.

3. On the other hand during this same period, with the same rates of inflation, the Seventh Pay Commission has awarded a minimum wage of Rs.18,000 per month for government employees (which amounts to Rs 692 per day for 26 days of work in a month). Please note that this monthly wage is more than what a household in many states would earn from a 100 days of MGNREGA work.

4. Revision of MGNREGA wages due to inflation takes place only once a year, while it is the norm that wages are revised twice a year for workers in most industries and occupations.

5. The Act states that MGNREGA has been enacted for livelihood security. However, with such low wages (combined with long delays in payments), the Act does not provide such security. In fact, workers are being forced to migrate and work in precarious conditions in far-away places. There has been little improvement in livelihood security, with workers just as vulnerable to unemployment and hunger in their own villages and susceptible to exploitation by contractors and agents and bondage as migratory workers. The need to raise wages is all the more urgent as persistent delays in payments further reduce the ‘real’ wages that people get.

6. States are following disparate methodologies for calculation of their minimum wages. Most importantly, they are ignoring the well accepted recommendations laid down by the 15th Indian Labour Conference and the Ackroyd Committee, which have been upheld time and again by the Supreme Court and the Supreme Court orders in the Raptakos Brett case for calculation of minimum wage (See Annexure or

7. The Seventh Pay Commission has also used these norms to determine the minimum wage for government employees.

In these circumstances we would like to place the following demands before your committee:

1. As has been recommended by the Seventh Pay Commission, the Government of India should declare a floor level minimum wage for the country based on the recommendations of the 15th Indian Labour Conference, the Akroyd Committee and the Supreme Court orders in the Raptakos Brett case. This should be the wage for MGNREGA and all minimum wages declared by states should be equal to or above this minimum floor.

2. The Consumer Price Index Rural should be used to revise the wages every year thereafter instead of Consumer Price Index Agriculture as the former is more representative of the current rural consumption basket. In addition, wage revision should take place every six months, in keeping with the practice for other trades and occupations.

We look forward to your response and positive action on our demands.

Thanking you,

Yours sincerely

Anuradha Talwar, Arundhati Dhuru, Kamayani Swamy and Ankita Aggarwal

For NREGA Sangharsh Morcha

o o o

श्री नागेश सिंह
अपर सचिव
ग्रामीण विकास मंत्रालय
कृषी भवन
नई दिल्ली

विषय: मनरेगा मज़दूरी के संशोधन की वर्तमान प्रक्रिया से सम्बंधित चिंताएं व सुझाव.

आदरणीय श्री नागेश सिंह,

नरेगा संघर्ष मोर्चा जन संगठनों, गैर-सरकारी संस्थाओं, ट्रेड यूनियनों व अन्य लोगों का एक राष्ट्रीय मंच है जो मज़दूरों के महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोज़गार गारंटी कानून (मनरेगा) के अधिकारों पर काम करता है. खबरों से हमें पता चला कि आपकी अध्यक्षता में एक कमिटी का गठन हुआ है जो मनरेगा मज़दूरी में संशोधन पर विचार विमर्श करेगी. इस सन्दर्भ में हम आपका ध्यान निम्न मुद्दों की ओर आकर्षित करना चाहेंगे:

  • मनरेगा का काम खेती व निर्माण कार्य के समान है. परन्तु, मनरेगा मज़दूरी कई राज्यों की खेतिहर मज़दूरी व निर्माण कार्य की मज़दूरी से कम है. यह संविधान की धारा 14 में दिए गए समानता के मौलिक अधिकार का हनन है. इतनी कम मज़दूरी में काम करवाना धारा 21 में दिए गए जीने के अधिकार का भी हनन है. बल्कि, सर्वोच्च न्यायालय का आदेश है कि न्यूनतम मज़दूरी से कम में काम करवाना बंधुआ मज़दूरी के सामान है और संविधान की धारा 23 बंधुआ मज़दूरी पर रोक लगाती है.
  • चूंकि कई राज्यों में मनरेगा मज़दूरी न्यूनतम मज़दूरी से कम है, मनरेगा मज़दूरी का सालाना Consumer Price Index – Agriculture (CPI – AL) के अनुसार संशोधन एक मज़ाक बन गया है. 2017-18 में तो असम, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की मनरेगा मज़दूरी पिछले साल की तुलना मात्र एक रुपये ही बढ़ी.
  • परन्तु इस ही दौरान, सातवें वेतन आयोग ने सरकारी कर्मचारियों के लिए 18,000 रुपए प्रति महीने की न्यूनतम मज़दूरी तय की है (यानी 692 रुपये प्रति दिन, महीने में 26 दिन काम करने के लिए). कुछ राज्यों के ग्रामीण परिवार तो मनरेगा में 100 दिन काम करने के बाद भी सातवे वेतन आयोग द्वारा तय की गई न्यूनतम मासिक मज़दूरी नहीं कमा पाएंगे.
  • मनरेगा मज़दूरी का संशोधन साल में एक बार ही होता है, जबकि अधिकतर व्यवसायों के मज़दूरों की मज़दूरी साल में दो बार बढ़ती है.
  • मनरेगा कानून में लिखा गया है कि इस कानून का उद्देश्य आजीविका सुरक्षा है. परन्तु, इतनी कम मज़दूरी और भुगतान में इतने लम्बे विलम्ब के कारण मनरेगा यह उद्देश्य पूरा नहीं कर पा रहा है. इसके कारण मज़दूरों को अभी भी मजबूरी में पलायन कर अपने गाँव से दूर काम करना पड़ रहा है. अभी भी मज़दूर भूख, बेरोज़गारी और बिचौलियों द्वारा शोषण के शिकार हो रहे हैं. मनरेगा मज़दूरी को तुरंत बढ़ाना इसलिए भी आवश्यक है क्योकि भुगतान में लम्बे विलम्ब के कारण मज़दूरी का वास्तविक मूल्य और कम हो जाता है.
  • राज्य अपनी न्यूनतम मज़दूरी निर्धारित करने के लिए अलग अलग प्रणालियाँ अपनाते हैं. परन्तु वे 15वें भारतीय मज़दूर सम्मलेन और ऐक्रोइड कमिटी की अनुशंसाओं व रैप्टाकौस ब्रेट मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश को नज़रंदाज़ कर देते हैं.[1] सातवें वेतन आयोग ने भी सरकारी कर्मियों की न्यूनतम मज़दूरी तय करने के लिए इन मानकों का प्रयोग किया है.

इस परिप्रेक्ष्य में हम आपकी कमिटी से निम्न मांगे करते हैं:

  • जैसा कि सातवे वेतन आयोग ने अनुशंसा की है, भारत सरकार 15वें भारतीय मज़दूर सम्मलेन, ऐक्रोइड कमिटी की अनुशंसाओं व रैप्टाकौस ब्रेट मामले में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के अनुसार देश के लिए एक न्यूनतम मज़दूरी घोषित करे. मनरेगा मज़दूरी और राज्यों की न्यूनतम मज़दूरी इस निर्धारित मज़दूरी से कम न हो.
  • उसके बाद मनरेगा मज़दूरी का संशोधन Consumer Price Index Rural (CPI R) के अनुसार हो और न कि CPI – AL चूंकि CPI R वर्तमान स्थिति को अधिक सटीक दर्शाता है. अधिकतर व्यवसायों की भाँति, मनरेगा मज़दूरी का भी साल में दो बार संशोधन हो.

हब आपके जवाब व हमारी मांगों पर कार्रवाई की अपेक्षा करते हैं.

आपके विश्वसनीय

अनुराधा तलवार, अरुंधती धुरू, कामायनी स्वामी और अंकिता अग्रवाल

नरेगा संघर्ष मोर्चा की ओर से


[see also related news report: ’Rs 1 wage hike for MGNREGA workers won’t do’ Rosamma Thomas | TNN | July 1, 2017 /59401399.cms ]